واپسی
वापसीپھر وہی چاندنی راتوں کا سماں اورتری قربت کا خیال
پھر وہی جاں کا زیاں اور وہی بے سود سوال
تیری آنکھوں کے ستارے میری منزل کا چراغ
تیری پلکوں کے اشارے میری راہوں کا سراغ
میں نے چاہا تھا کہ اندوہ جفا سے چھوٹوں
میں نے چاہا تھا کہ اقرار وفا سے پلٹوں
تیرگی شب کی مجھے یوں تیرے درتک لائی
پھر وہی طوق ملامت میرے سر آئ
میں نے گھبرا کے رگ جاں سے جو نشتر کھینچا
پوچھ مت مجھ سے کہ یہ کرب کہاں تک پہونچا
موسموں کی طرح چہروں کو بدلتے دیکھا
چاندنی رات میں سورج کو نکلتے دیکھا
چارہ سازوں کو بھی شمشیر برہنہ دیکھا
پوچھ مت مجھ سے کے ان آنکھوں نے کیا کیا دیکھا
عمر اپنی تو یونہی قرض چکاتے گزری
جو نہ واجب تھے وہی فرض نبھاتے گزری
ہم طرح دار ہیں ایسے کہ ادا رکھتے ہیں
خوں بہا دیتے ہیں پھر قرض ادا کرتے ہیں
زد پہ آیا جوعدو چھوڑ دیا کرتے ہیں
اپنے اپنے بھی کچھ انداز ہوا کرتے ہیں
کج کلاہی بھی اگرکی ہے تو ایسی کی ہے
اپنے ہاتھوں ہی سے خود زہرہلاہل پی ہےپھر اسی طوق حزیمت کو پہننے کے لئے
تیرگی شب کی مجھے پھر تیرے درتک لائی
اب نہ پلٹوں گا میں اقرا وفا سے ہمدم
تیرے پندار وفا کی میں قسم کھاتا ہوں .
احمد عرفان
फिर वही चांदनी रातों का समां फिर तेरी क़ुर्बत का ख़याल
फिर वही जां का ज़ीयां और वही बे सूद सवाल
तेरी पलकों के इशारे मेरी राहों का सुराग़
मेंने चाहा था के अंदोहे जफा से छूटूं
मेंने चाहा था के इक़्रार-ऐ- वफ़ा से पलटूं
तीरगी शब् की मुझे यूँ तेरे दर तक लाई
फिर वही तौक़े मलामत मेरे सर आयी
मैने घबरा के रगे जां से जो नश्तर खींचा
पूछ मत मुझ के यह कर्ब कहाँ तक पंहुचा
मोस्मों की तरह चेहरों को बदलते देखा
चांदनी रात में सूरज को निकलते देखा
चारा साजों को भी शमशीर बिरहना देखा
पूछ मत मुझसे के इन आँखों ने क्या क्या देखा ?
उम्र अपनी तो यूँ ही क़र्ज़ चुकाते गुजरी
जो न वाजिब थे वही फ़र्ज़ निभाते गुजरी
हम तरह दार हैं ऐसे के अदा रखते हैं
खूं बहा देते हैं फिर क़र्ज़ अदा करते हैं
ज़द पे आया जो उदू छोड़ दिया करते हैं
अपने अपने भी कुछ अंदाज़ हुआ करते हैं
कज कुलाही भी अगर की है तो ऐसी की है
अपने हाथो' ही से ख़ुद ज़हर-ऐ-हला-हल पी है
फिर उसी तौक़-ऐ-हज़ीमत को पहन-ने-के लिए
तीरगी शब् की मुझे फिर तेरे दर तक लाई
अब न पल्टू' गा में इक़रा-ऐ-वफ़ा से हमदम
तेरे पिन्दार-ऐ-वफ़ा की मैं क़सम खाता हूँ।
मेंने चाहा था के इक़्रार-ऐ- वफ़ा से पलटूं
तीरगी शब् की मुझे यूँ तेरे दर तक लाई
फिर वही तौक़े मलामत मेरे सर आयी
मैने घबरा के रगे जां से जो नश्तर खींचा
पूछ मत मुझ के यह कर्ब कहाँ तक पंहुचा
मोस्मों की तरह चेहरों को बदलते देखा
चांदनी रात में सूरज को निकलते देखा
चारा साजों को भी शमशीर बिरहना देखा
पूछ मत मुझसे के इन आँखों ने क्या क्या देखा ?
उम्र अपनी तो यूँ ही क़र्ज़ चुकाते गुजरी
जो न वाजिब थे वही फ़र्ज़ निभाते गुजरी
हम तरह दार हैं ऐसे के अदा रखते हैं
खूं बहा देते हैं फिर क़र्ज़ अदा करते हैं
ज़द पे आया जो उदू छोड़ दिया करते हैं
अपने अपने भी कुछ अंदाज़ हुआ करते हैं
कज कुलाही भी अगर की है तो ऐसी की है
अपने हाथो' ही से ख़ुद ज़हर-ऐ-हला-हल पी है
फिर उसी तौक़-ऐ-हज़ीमत को पहन-ने-के लिए
तीरगी शब् की मुझे फिर तेरे दर तक लाई
अब न पल्टू' गा में इक़रा-ऐ-वफ़ा से हमदम
तेरे पिन्दार-ऐ-वफ़ा की मैं क़सम खाता हूँ।
अहमद इरफान
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