हिजरतों का सफ़र
बीस बरस की हिजरत से जब अहमद घर को आए हैं
कैसे कैसे लोग थे यारो जो हम से कतराय हैं
फसले बहारां आयी तो हम अपने घर की क्यारी से
बस यूँ ही गए थे फूल को चुनने हाथ जला कर आए हैं
कैसे कैसे सपने ले कर सहराओं के देस से लौटे
अपने आंगन में आकर हम मन ही मन पछताए हैं
अहले हवस हैं अपनी सफ में औरों की क्या बात करें
सहने चमन से यह देखो हम चाक गरेबान आए हैं
मुझ से दिल का हाल न पूछो चुप रहना ही बेहतर है
मौसमे गुल में हम ने लोगो ज़ख्म यह सारे खाए हैं
लुत्फो करम पर तस्बीहें जो पढ़ता था दिन रात मेरी
कैसी बेदर्दी से उसने सारे नक्श मिटाए हैं
कुछ लोग जो देखो दूर खड़े हैं उनमें कोई गैर नही
खाक हुआ जब मेरा नशेमन आग बुझाने आए हैं
बेगानों की बस्ती में तो घर अपना महफूज़ रहा
मेरे घर में मेरे अपने आग लगाने आए हैं
अहमद इरफान
बीस बरस की हिजरत से जब अहमद घर को आए हैं
कैसे कैसे लोग थे यारो जो हम से कतराय हैं
फसले बहारां आयी तो हम अपने घर की क्यारी से
बस यूँ ही गए थे फूल को चुनने हाथ जला कर आए हैं
कैसे कैसे सपने ले कर सहराओं के देस से लौटे
अपने आंगन में आकर हम मन ही मन पछताए हैं
अहले हवस हैं अपनी सफ में औरों की क्या बात करें
सहने चमन से यह देखो हम चाक गरेबान आए हैं
मुझ से दिल का हाल न पूछो चुप रहना ही बेहतर है
मौसमे गुल में हम ने लोगो ज़ख्म यह सारे खाए हैं
लुत्फो करम पर तस्बीहें जो पढ़ता था दिन रात मेरी
कैसी बेदर्दी से उसने सारे नक्श मिटाए हैं
कुछ लोग जो देखो दूर खड़े हैं उनमें कोई गैर नही
खाक हुआ जब मेरा नशेमन आग बुझाने आए हैं
बेगानों की बस्ती में तो घर अपना महफूज़ रहा
मेरे घर में मेरे अपने आग लगाने आए हैं
अहमद इरफान
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