Sunday, October 4, 2009

एय चारा गरो

एय चारा गरो
हम सोख्ता सामां हैं हमें यूँ सताओ
आए हो अगर पास तो' यूँ दूर जाओ
गिरते हुए बिजली को इन आँखों ने है देखा
किस किस के नशेमन पे गिरी है' बताओ
अब थक सा गया हूँ मैं अबद तक उठूं गा
आगोश मैं अपनी मुझे हरगिज़ सुलाओ
क्या इस से भी बढ़ कर कोई रुसवाई की हद है ?
रहने भी दो अब कोई नया गुल खिलाओ
आया हूँ मैं ख़ुद छोड़ के जलता हुआ गुलशन
एय चारा गरो फिर मुझे वापस बुलाओ
रहने भी दो कुछ नक्शे कुहन रह जो गए हैं
मैं मिट तो चुका हूँ मुझे इतना मिटाओ
अहमद जो सुनें गे तो हंसें गे यह सभी लोग
रूदादे चमन तुम इन्हें हरगिज़ सुनाओ
अहमद इरफान

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