Sunday, October 4, 2009

अनकही

अनकही
सब कुछ बिखर चुका है कोई आसरा नही
कैसे कहूं के मुझ को किसी से गिला नही
साया भी गर हो साथ तो आगे कभी चल
इस शहरे बे अमां में किसी से वफ़ा नही
जितने थे तीर तेरी कमां में वोह सब चले
मैं क्या करूं के फिर भी तेरा दिल भरा नही
मैंने नदाम्तों के भी दरया बहा दिए
लेकिन है उसमें पासे मुरव्वत ज़रा नही
तिनके समेटता रहा मैं उम्र भर यूँही
लेकिन ज़रा सी देर मैं कुछ भी रहा नही
मैंने रफ़ाक़तों मैं भी कुछ फासले रखे
ऐसी नज़ाकतों को वह समझा ज़रा नही
मेरी तबाहियों पे नदामत है क्यों उसे ?
मैंने तो इसका ज़िक्र किसी से क्या नही
वोह शख्स जिस का नाम है इरफान आगही
कहने को जी रहा है मगर वोह मारा नही
अहमद इरफान

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