Sunday, October 4, 2009

ग़ज़ल


ग़ज़ल
रुस्वाए जहाँ थे मगर ऐसे तो नही थे
बरबादिए गुलशन का सबब हम तो नही थे
वोह बर्क़ टी तेज़ी हो के शोले की लपक हो
अंजाम को पहुंचे तो सभी खाक नशीं थे
जिनके लिए मैं मंजिले मक़सूद से लौटा
जब घूम के देखा तो जहाँ थे वोह वहीँ थे
तुम पूछते क्या हो के नशेमन का हुआ क्या
जिस जिस ने मिटाया इसी घर के मकीं थे
जिन ख्वाबों की ताबीर मैं एक उम्र गँवाई
अब जा के यह समझा के वोः सब ख्वाबे हसीं थे
अहमद इरफान

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