Friday, November 6, 2009

شرفاۓ لکھنؤ
کہنے کو ہم ضرور ہیں شرفاۓ لکھنؤ
اس قول کا تضاد ہیں شرفاۓ لکھنؤ
وہ اور تھے جو سوے فلک کوچ کر گئے
باقی ہیں اب تو نام کے شرفاۓ لکھنؤ
ماضی سے بہرہ مند ہیں فردا سے بے خبر
کیسے عجیب لوگ ہیں شرفاۓ لکھنؤ
جاہ وحشم میں ان کا سا کوئی نہ ہو سکا
پلٹی ہوئی بساط ہیں شرفاۓ لکھنؤ
پاس و لحاظ وعجز و مروت ہے ان پہ ختم
کرتے ہیں وار پیچھے سے شرفاے لکھنو
ہر شخص مبتلا ہے یوں فسق و فجور میں
عزت ماب پھر بھی ہیں شرفاۓ لکھنؤ
دام قفس میں آیا ہے عرفان بے اماں
حالات سازگار ہیں شرفاۓ لکھنؤ
احمد عرفان

शुरफाये लखनऊ
कहने को हम ज़रूर हैं शुर्फाए लखनऊ
इस क़ौल का तज़ाद हैं शुर्फाए लखनऊ
वोह और थे जो सुए फ़लक कूच कर गए
बाकी हैं अब तो नाम के शुर्फाए लखनऊ
माज़ी से बहरा मंद हैं फ़र्दा से बे खबर
कैसे अजीब लोग हैं शुर्फाए लखनऊ
जाहो हषम में इनका सा कोई हो सका
मौज़ूए मुश्ते खाक हैं शुर्फाए लखनऊ
पासओ लिहाज़ो एज्ज़ो मुरव्वत है इनपे ख़त्म
करते हैं वार पीछे से शुर्फाये लखनऊ

हर फ़र्द मुब्तिला है यूँ फ़ुस्क़ो फ़ुजूर में
इज्जत मोआब फिर भी हैं शुर्फाए लखनऊ
दामे क़फ़स में आया है इरफान ऐ बे अमां
हालात साज़गार हैं शुर्फाए लखनऊ
अहमद इरफान

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